पेड के इर्द-गिर्द पड़े ये सूखे पत्ते,
कभी बड़ी शान से ऊँचे दरख़्त पर इठलाते थे,
हवा के हर झोखे के संग झूमते-बलखाते थे,
ओस की बूँदो से नहाते, चिड़िया से बाते करते थे!!
कभी यौवन से परिपूर्ण, परिवेश की शान थे,
अपने पेड़ के पालनहार, उसकी अनूठी पहचान थे,
सूरज की तेज धूप से बचाते,खुद जल जाते थे,
अपने पेड़ की खातिर ,आँधी से लड़ जाते थे!!
आज बेबस बेजान ,बेमतलब से लगते है,
ललचाई नज़रो से अपने आशियाने को तकते है,
आज इनकी जगह कुछ नये पत्तो ने ले ली है,
इनके साथ तो इनकी तन्हाई भी अकेली है!!
अपने घर के आँगन पे बैठा ये बुजुर्ग,
कुछ- कुछ इन सूखे पत्तो सा लगता है,
जिस घर को अपने खून से सीचा था,
आज उसकी चौखट पे बैठा सूखे पत्ते सा दिखता है!!
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