वक्त की शाख से तोड़ कर रखे थे कुछ लम्हे
तुम भी कुछ उलझे रहे हम भी कुछ मसरूफ रहे.
अब तो आ जाओ…..
ये लम्हे अब सूख रहे है.
Search This Blog
Monday, May 9, 2011
सूखे पत्ते
पेड के इर्द-गिर्द पड़े ये सूखे पत्ते,
कभी बड़ी शान से ऊँचे दरख़्त पर इठलाते थे,
हवा के हर झोखे के संग झूमते-बलखाते थे,
ओस की बूँदो से नहाते, चिड़िया से बाते करते थे!!
कभी यौवन से परिपूर्ण, परिवेश की शान थे,
अपने पेड़ के पालनहार, उसकी अनूठी पहचान थे,
सूरज की तेज धूप से बचाते,खुद जल जाते थे,
अपने पेड़ की खातिर ,आँधी से लड़ जाते थे!!
आज बेबस बेजान ,बेमतलब से लगते है,
ललचाई नज़रो से अपने आशियाने को तकते है,
आज इनकी जगह कुछ नये पत्तो ने ले ली है,
इनके साथ तो इनकी तन्हाई भी अकेली है!!
अपने घर के आँगन पे बैठा ये बुजुर्ग,
कुछ- कुछ इन सूखे पत्तो सा लगता है,
जिस घर को अपने खून से सीचा था,
आज उसकी चौखट पे बैठा सूखे पत्ते सा दिखता है!!
कभी बड़ी शान से ऊँचे दरख़्त पर इठलाते थे,
हवा के हर झोखे के संग झूमते-बलखाते थे,
ओस की बूँदो से नहाते, चिड़िया से बाते करते थे!!
कभी यौवन से परिपूर्ण, परिवेश की शान थे,
अपने पेड़ के पालनहार, उसकी अनूठी पहचान थे,
सूरज की तेज धूप से बचाते,खुद जल जाते थे,
अपने पेड़ की खातिर ,आँधी से लड़ जाते थे!!
आज बेबस बेजान ,बेमतलब से लगते है,
ललचाई नज़रो से अपने आशियाने को तकते है,
आज इनकी जगह कुछ नये पत्तो ने ले ली है,
इनके साथ तो इनकी तन्हाई भी अकेली है!!
अपने घर के आँगन पे बैठा ये बुजुर्ग,
कुछ- कुछ इन सूखे पत्तो सा लगता है,
जिस घर को अपने खून से सीचा था,
आज उसकी चौखट पे बैठा सूखे पत्ते सा दिखता है!!
Thursday, May 5, 2011
एक जिंदगी
अधूरी कहानी बयां करती पूरी एक जिंदगी,
खुशियों की चाह लिए गम में डूबी एक जिंदगी,
अपने वजूद को तलाशती एक जिंदगी,
गुमनामियों के भंवर में भटकती जिंदगी,
ख्वाहिशों की चादर तले सिमटती जिंदगी,
सुलझनों की चाह में उलझती एक जिंदगी,
जीने की चाह में दम तोडती एक जिंदगी
खुशियों की चाह लिए गम में डूबी एक जिंदगी,
अपने वजूद को तलाशती एक जिंदगी,
गुमनामियों के भंवर में भटकती जिंदगी,
ख्वाहिशों की चादर तले सिमटती जिंदगी,
सुलझनों की चाह में उलझती एक जिंदगी,
जीने की चाह में दम तोडती एक जिंदगी
कुछ ख्वाबो
कुछ ख्वाबो कि राख
आज एक पुरने डब्बे मे मिली
नर्म गुलाबि धागे से बाँधे
कुछ पंनेँ
और उन्पर नीली स्याही से लिकखे हुए
कुछ नग्मे
आँख से टप्कते अश्कोण के सूखे धब्बे ,
और मुर्झये हुए पूलोँ के कुछ बिख्रे काटे
सफेद कागाज़ पर पिरोए कुछ सुनहरे मोती
कुछ खाट जो उसने मुझे लिकखे थे कभी
एक कोणे मे चाँदी कि एक तानह पायल
और एक काढे हुए रुमाल मे दो सुरख लबो के निशा
इन क़तल हुए ख्वाबोन मे ज़िन्दा है कुछ अबभि
इक भीणी सि खुशबू
कुछ तेज़ धारकने
और बन्द आँखो के पीछे
ईक् प्यार कि नामी .
आज एक पुरने डब्बे मे मिली
नर्म गुलाबि धागे से बाँधे
कुछ पंनेँ
और उन्पर नीली स्याही से लिकखे हुए
कुछ नग्मे
आँख से टप्कते अश्कोण के सूखे धब्बे ,
और मुर्झये हुए पूलोँ के कुछ बिख्रे काटे
सफेद कागाज़ पर पिरोए कुछ सुनहरे मोती
कुछ खाट जो उसने मुझे लिकखे थे कभी
एक कोणे मे चाँदी कि एक तानह पायल
और एक काढे हुए रुमाल मे दो सुरख लबो के निशा
इन क़तल हुए ख्वाबोन मे ज़िन्दा है कुछ अबभि
इक भीणी सि खुशबू
कुछ तेज़ धारकने
और बन्द आँखो के पीछे
ईक् प्यार कि नामी .
क्यूँ दूरियाँ घट ती नहीं
क्यूँ दूरियाँ घट ती नहीं
क्यूँ फ़ासले सिमट ते नहीं
बेचैनियाँ बदती रही,हैरानीयाँ थमती नहीं
क्यूँ जाम गयी आँखें मेरी
उन्न रास्तों पे,तू जिनपे चली
कंधे पे क्यूँ महसूस हो
हाथ तेरा,
तुम्हे जलाए थे जो दिए
मैने कभी ना,बुज्जाने दिए
दिए जाग रहे, हम जी रहे
मिले राहों में तू, कभी ना कभी
क्यूँ दूरियाँ घाट ती नहीं, क्यूँ फ़ासले सिमट ते नहीं
बेचैनियाँ बदती रही, हैरानीयाँ थमती नहीं
क्यूँ दूरियाँ घाट ती नहीं, क्यूँ फ़ासले सिमट ते नहीं
क्यूँ फ़ासले सिमट ते नहीं
बेचैनियाँ बदती रही,हैरानीयाँ थमती नहीं
क्यूँ जाम गयी आँखें मेरी
उन्न रास्तों पे,तू जिनपे चली
कंधे पे क्यूँ महसूस हो
हाथ तेरा,
तुम्हे जलाए थे जो दिए
मैने कभी ना,बुज्जाने दिए
दिए जाग रहे, हम जी रहे
मिले राहों में तू, कभी ना कभी
क्यूँ दूरियाँ घाट ती नहीं, क्यूँ फ़ासले सिमट ते नहीं
बेचैनियाँ बदती रही, हैरानीयाँ थमती नहीं
क्यूँ दूरियाँ घाट ती नहीं, क्यूँ फ़ासले सिमट ते नहीं
मन की उथल-पुथ
मन की उथल-पुथल,लहरें ,हज़ारों ख्वाब , अनगिनत सितारों की बारात, मगर एक हसरत, एक ही ख्वाहिश
के तुम आओ ….
पहले सा चुपके से पीछे से आकर , जकड़ो हमे, खुद की ,हमारी भावनाओ में भिगो और भिगाओ…
खामोशियाँ , तनहाईयाँ , आहटें और तेरी यादों के तराने इन सब को गहरी नींद सुलाओ…
बहुत कुछ कहना है दिल को, बेहद हसीन अरमान सजाए है उसने, उन्हे निभाने आओ…डरता हूँ कभी आवेश में आकर कुछ ज्यादा कह दिया और तुम बुरा न मान जाओ….
जैसे हमे कहना , वैसे तुम्हे भी कहना होगा कुछ, अपना दासता-ए-दिल सुनाओ…….
के तुम आओ ….
पहले सा चुपके से पीछे से आकर , जकड़ो हमे, खुद की ,हमारी भावनाओ में भिगो और भिगाओ…
खामोशियाँ , तनहाईयाँ , आहटें और तेरी यादों के तराने इन सब को गहरी नींद सुलाओ…
बहुत कुछ कहना है दिल को, बेहद हसीन अरमान सजाए है उसने, उन्हे निभाने आओ…डरता हूँ कभी आवेश में आकर कुछ ज्यादा कह दिया और तुम बुरा न मान जाओ….
जैसे हमे कहना , वैसे तुम्हे भी कहना होगा कुछ, अपना दासता-ए-दिल सुनाओ…….
Subscribe to:
Comments (Atom)