अजब पहेली है ये रिश्ते, पल पल ये बदलते रिश्ते, कभी इस मन कभी उस मन जुरते, कभी इक पेहचान को जुझते, कभी गुमनामी मे कलप्ते, ये रिश्ते ना मांगे धन, मांगे तो बस अपनापन, वक़त बदला रिश्ते बदले, अपनापन तो बस अब मिथ्या...
ये साए हैं , दुनिया की परछाइयों की भरी भीड़ में , खाली तनहाइयों की यहाँ कोई साहिल - सहारा नहीं है कहीं डूबने को किनारा नहीं है बहुत हमने चाहा ज़रा नींद आये यहाँ सारे चेहरे हैं मांगे - हुए - से निगाहूँ में आंसू भी टाँगे - हुए से बड़ी नीची राहें हैं उचाइयों की ये साए हैं , दुनिया की परछाइयों की भरी भीड़ में , खाली तनहाइयों की...